दुआ (कहानी, मुंबई अंडरवर्ल्ड पर साहित्यिक दृष्टि)

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दुआ

लेखक – विवेक अग्रवाल

 

“तुम आज भी जाने वाले हो क्या?”

 

सलमा ने परदे की आड़ से ही इकबाल से सवाल किया। ये फजूल सवाल एक बार फिर इकबाल को नागवार हो गुजरा। उसने हमेशा की तरह आज भी जवाब नहीं दिया। सलमा कुछ देर इंतजार करती रही, जवाब न आया तो परदे की ओट से हट गई। जानती थी इकबाल बाहर गया तो जिंदा लौटेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता।

जब निकाह हुआ था, तब तो इकबाल ऐसा न था। अलमस्त, जहीन, बड़ा जिम्मेदार, खुदा का नेक बंदा। कुदरत भी क्या-क्या करिश्मे दिखाती है। कल तक जो पांच वक्त नमाज के बाद दुनिया की खैर मांगता था, आज कत्लोगारत में गाफिल है। होगा भी क्यों नहीं, दानिश भाई का सबसे करीबी था। दानिश भाई वो ही, जिनकी बी-कंपनी चलती है। इकबाल पर बड़ा करम है उनका।

 

सलमा को याद है वह दिन, जब पेट से थी, दर्द उठा तो घर में कोई न था। इकबाल का फोन भी लग नहीं रहा था। मदद मांगती भी तो किससे। आसपड़ोस में भी कोई था नहीं। वह किसी तरह इमारत के नीचे तो आ पहुंची लेकिन तंग गलियों में कोई टैक्सी भी मिलती तो कैसे। अम्मी-अब्बा को दूर बिहार के गांव फोन करती भी तो वे अल्लाह की खैर मांगने के अलावा कर क्या सकते थे।

 

तभी वहां से दानिश भाई कुनबे समेत कार में कहीं निकले। इस हाल में सलमा को खड़े देखा तो बाकियों को घर जाने की हिदायत देते हुए नीचे उतार दिया। अपनी बीवी के साथ कार में सलमा को बैठा कर अस्पताल चल दिए।

 

सलमा को अस्पताल में भर्ती करते समय फॉर्म पर साईन करने का वक्त आया। दानिश भाई ने उस पर रिश्ते के कॉलम में भाई लिख कर दस्तखत कर दिए। जितना लगा, उतनी रकम खर्च करते गए। सलमा का खून बहुत बहने लगा तो दानिश भाई के बेटों और साथियों ने चंद मिनटों में खून का ढेर लगा दिया।

 

अफसोस कि उनकी तमाम खिदमत और खर्च काम न आए। बच्चे ने पैदा होने के कुछ समय बाद ही दम तोड़ दिया। तब तक इकबाल भी वहां आ पहुंचा था। इस अजन्मे की मौत ने इकबाल और सलमा को तोड़ कर रख दिया। अहसान का बदला चुकाने के लिए इकबाल ने दानिश भाई के हाथ का बोसा लेकर हलफ उठाया कि जब तक उसकी जान है, तब उनकी अमानत है।

 

एक वो दिन है, एक आज का दिन है। एक जान बचाने के एवज, न जाने कितनी जानें ले चुका है इकबाल। वह दानिश भाई का सबसे खतरनाक सुपारी हत्यारा है। यह भी क्या अजब दुनिया है। जान बचाने की कीमत जान लेना। यही तो अंडरवर्ल्ड हैं। दुनियावी तौरतरीकों के बाहर, अपने ही कायदे गढ़ती है काली परछाईयों की दुनिया।

 

बीते वक्त में खोई सलमा नमाज के लिए मुसल्ला बिछा रही है। घर की खामोशी गोलियों की आवाज से टूटती है, जो इमारत के नीचे से आ रही है। सलमा खिड़की तक जाती है। नीचे तेजी से जाती एक मोटरसाईकिल दिखती है। हेल्मेट पहने दो सवार दिखते हैं। खून से लथपथ इकबाल दिखता है। सलमा की चीख गले में ही घुट कर रह जाती है।

 

वह चुपचाप नमाज की नीयत करती है। बाद नमाज दुआ पढ़ी, “या खुदा मेरे इकबाल के गुनाह बख्शना… उसने जो किया, मेरे लिए किया… इस एक जान जाने से न जाने कितनी जान बचेंगीं… और खुदा दानिश भाई जैसों के दिल से इंसानियत का जज्बा खत्म कर दे ताकी और इकबाल पैदा न हों… आमीन…”

 

(प्रथम प्रकाशित – कार्टून वॉच पत्रिका, रायपुर, छत्तीसगढ़, अप्रैल 2018 अंक में)

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