मुंबईः जीवन की तामाम विसंगतियों पर प्रहार करने और तीखे सवाल उठाने वाले तीन नाटकों का मंचन संहिता मंच नाट्य उत्सव 2017 में हुए। नाट्य समारोह के आरंभ में रंजीत कपूर, त्रिपुरारी शर्मा व कुमुद मिश्रा की चयन समिति द्वारा “सत भाषे रैदास” समेत चुने नाटकों का संकलन “रंगकलम” पुस्तक के रूप भी प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक का संपादन विवेक अग्रवाल और अलका अग्रवाल सिग्तिया ने किया है।

Rangkalam Book Cover FINAL

 

भारतीय समाज में अंदर तक जड़ जमाए जातिवाद की विसंगतियों पर प्रहार करने वाले पंद्रहवीं सदी के महान कवि और समाज सुधारक संत रविदास के जीवन पर आधारित नाटक “सत भाषे रैदास” का बीइंग असोसिएशन के रंगकर्मियों द्वारा संहिता मंच के बैनर तले दादर प्रभादेवी में स्थित रविंद्र नाट्य मंदिर के पीएल देशपांडे सभागृह में कई नामचीन रंगकर्मियों की मौजूदगी में हुआ।

 

स्टोरी मिरर ने रंगकलम प्रकाशित कर रंगमंच व साहित्य के संबंध को नए आयाम दिए। स्टोरी मिरर के निदेशक विभु दत्ता राऊत ने कहा कि उनका संस्थान हिंदी की स्तरीय सामग्री पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हिंदी नाटकों के सिकुड़ते संसार को विस्तार देने के लिए बीईंग एसोसिएशन के इस महान यज्ञ में हम भी कुछ आहुती देकर खुद को धन्य समझ रहे हैं।

 

पिछले दिनों बीइंग असोसिएशन ने संहिता मंच के बैनर तले राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी नाटक लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया। करीब 80 प्रतियोगियों की रचनाएं मिलीं, जिसमें से पांच सर्वश्रेष्ठ पटकथाओं का चयन हुआ। इन्हें मंचन के लिए भी चुना है।

 

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उसी क्रम में तीन दिवसीय समारोह के पहले दिन समाज सुधारक संत रविदास के जीवन पर आधारित राजेश कुमार द्वारा लिखित नाटक “सत भाषे रैदास” के अलावा बालाजी गौरी के “फैज अहमद फैज” और अवनीश सिंह के नाटक “पत्थर के फूल” और राहुल राय के नाटक “दालमोठ” का बेहतरीन मंचन 16, 17 और 18 को पीएल देशपांडे नाट्यगृह में हुए।

 

रसिका आगाशे के निर्देशन में सत भाषे रैदास को आधुनित समाज में व्याप्त कुरीतियों से जोड़ते हुए मंचित किया। क़रीब दो घंटे के नाटक में कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय क्षमता से दर्शकों को बांधे रखा। नाटक में बीच-बीच में हास्य प्रसंगों और प्रभावशाली संवादों से दर्शक दीर्घा में बैठे लोग ठहाके लगाने पर मजबूर होते रहे। कहीं-कहीं विसंगतियों पर जिस तरह कटाक्ष किया जा रहा था, वह अंदर तक झकझोर गया।

 

इन नाटक की खिसियत यह रही कि कलाकारों ने मंझे हुए गायक की तरह संत रविदास के पद भी खुद ही गाए, पार्श्वगायकों का इस्तेमाल नहीं किया। अपनी रचनाओं से समाज में व्याप्त बुराइयां दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले संत रविदास का किरदार जीवंत हो गया। तीन दिवसीय समारोह में हिंदी के इन नाटककारों पर प्रदर्शनी के अलावा लेखकों-निर्देशकों से चर्चा का आयोजन भी हुआ।